अक्सर हम सोचते हैं कि बड़े सपने देखने के लिए बड़ा पैसा, पढ़ाई या सहारा जरूरी होता है. लेकिन केरल के मलप्पुरम जिले की शरीफा कलथिंगल ने यह साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों, तो 100 रुपये भी किस्मत बदल सकते हैं. जिस महिला के घर में कभी चावल का दलिया खरीदने तक के पैसे नहीं थे, वही महिला आज करोड़ों की संपत्ति की मालकिन है और दर्जनों महिलाओं को रोजगार दे रही है. गरीबी, ताने, बैंकों की बेरुखी और कोरोना जैसी महामारी, हर मुश्किल ने उनका रास्ता रोकने की कोशिश की, लेकिन शरीफा ने हर बार हालात को मात दी, आज वह केरल में महिला उद्यमिता की एक बड़ी मिसाल बन चुकी हैं. तो आइए जानते हैं कि 100 रुपये कर्ज लेकर बेचीं रोटियां और अब 2 रेस्तरां की मालकिन की सक्सेस स्टोरी क्या है.
2 रेस्तरां की मालकिन की सक्सेस स्टोरी क्या है
शरीफा कलथिंगल का जीवन शुरू से ही आसान नहीं था. उनके पति सक्कीर पेशे से पेंटर थे. काम मौसम पर निर्भर करता था, खासकर बारिश के दिनों में तो घर की हालत बहुत खराब हो जाती थी. कई बार ऐसा भी होता था कि घर में खाने के लिए सिर्फ चावल का पतला दलिया ही बचता था. एक दिन हालात इतने बिगड़ गए कि घर में कुछ भी पकाने के लिए नहीं था तभी शरीफा ने तय किया कि वह हालात के आगे हार नहीं मानेंगी. शरीफा ने पड़ोस की एक महिला से 100 रुपये उधार लिए. उसी पैसे से उन्होंने चावल का आटा और गुड़ खरीदा और केरल की पारंपरिक मिठाई उन्नियप्पम बनानी शुरू की.
उनकी एक साल की छोटी बेटी थी. उसे गोद में उठाकर शरीफा रोज करीब 4 किलोमीटर पैदल चलकर स्थानीय दुकानों तक जाती थीं और अपने बनाए उन्नियप्पम बेचने की कोशिश करती थीं. शुरुआत में दुकानदारों को भरोसा नहीं था. कुछ ने मना कर दिया, कुछ ने ताने भी मारे, लेकिन जब पहले ही दिन उनके बनाए 10 पैकेट बिक गए, तो शरीफा का कॉन्फिडेंस बढ़ गया. धीरे-धीरे वह उन्नियप्पम के साथ-साथ पाथरी और चपाती भी बनाने लगीं. लोग उन्हें मजाक में उन्नियप्पम इथाथा (बड़ी बहन) कहने लगे, लेकिन शरीफा ने इन बातों पर ध्यान नहीं दिया.
बैंक ने कर्ज देने से किया इनकार
छोटे स्तर पर काम चलने लगा तो शरीफा ने एक छोटा कैटरिंग बिजनेस शुरू करने का सपना देखा. इसके लिए उन्होंने बैंकों से कर्ज मांगा, लेकिन कोई भी बैंक तैयार नहीं हुआ. वजह थी उनके पास गिरवी रखने के लिए कोई संपत्ति नहीं थी. यह समय उनके लिए बहुत निराशाजनक था. लेकिन शरीफा ने हार नहीं मानी, उन्होंने केरल सरकार की महिला सशक्तिकरण योजना कुटुम्बश्री से जुड़ने का फैसला किया.
साल 2018 में कुटुम्बश्री के जरिए शरीफा को 2 लाख रुपये का लोन मिला. इस पैसे से उन्होंने अपने बेटे के नाम पर मुथु कैटरिंग की शुरुआत की, धीरे-धीरे उनके खाने की पहचान बनने लगी. वह बिरयानी, पाथरी और चपाती की सप्लाई करने लगीं। बाद में उन्होंने सरकारी कर्मचारियों के लिए टिफिन (डब्बा सेवा) भी शुरू की, जिसमें रोज 50–60 लोगों को खाना दिया जाता था.
कोरोना काल बना टर्निंग पॉइंट
साल 2020 में कोरोना महामारी के कारण उनका काम लगभग बंद हो गया. सारे ऑर्डर रुक गए. लेकिन इसी मुश्किल समय में कुटुम्बश्री ने उन्हें मंजेरी मेडिकल कॉलेज में कोरोना मरीजों के लिए खाना सप्लाई करने का मौका दिया.
शरीफा ने इस मौके को पूरी मेहनत से अपनाया. उन्होंने करीब 2000 मरीजों के लिए नाश्ता और दलिया बनाना शुरू किया. इस काम के लिए उन्होंने कई महिलाओं को रोजगार भी दिया. कोरोना के बाद शरीफा को कोट्टक्कल आयुर्वेद कॉलेज की कैंटीन चलाने का मौका मिला.
यहां से उनका कारोबार और तेजी से बढ़ा. इसी सफलता के दम पर उन्होंने कोट्टक्कल में अपना पहला होटल खरीदा., बाद में उन्होंने कैफे कुटुम्बश्री के नाम से एक और रेस्तरां शुरू किया. आज वह 2 रेस्तरां की मालकिन हैं और उनका बिजनेस लगातार आगे बढ़ रहा है. आज शरीफा कलथिंगल सिर्फ एक सफल कारोबारी महिला नहीं हैं, बल्कि 40 से ज्यादा महिलाओं के लिए रोजगार का सहारा भी हैं. उनके पति सक्कीर अब पेंटिंग का काम छोड़कर उनके रेस्तरां के मैनेजमेंट में हाथ बंटाते हैं.
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