Uterine Cancer: एक नए रिपोर्ट से यह सामने आया है कि गर्भाशय कैंसर से पीड़ित कई महिलाओं की लिंच सिंड्रोम नामक आनुवंशिक स्थिति की सही तरीके से जांच नहीं की जा रही है. यह स्थिति न केवल गर्भाशय, बल्कि आंतों के कैंसर का खतरा भी काफी हद तक बढ़ा देती है.
लिंच सिंड्रोम : गंभीर लेकिन अनदेखा खतरा
लिंच सिंड्रोम हर 300 में से एक व्यक्ति को प्रभावित करता है, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से केवल 5% लोग ही इसके बारे में जानते हैं. यह एक आनुवंशिक स्थिति है जो व्यक्ति को गर्भाशय और कोलन (बड़ी आंत) के कैंसर के प्रति अधिक संवेदनशील बना देती है.
समय पर पहचान से मिल सकता है जीवनदान
यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग के विशेषज्ञों का कहना है कि इस सिंड्रोम की समय पर पहचान होने से मरीज अपने स्वास्थ्य को बेहतर बना सकते हैं और कैंसर से बचाव के लिए जरूरी कदम उठा सकते हैं. साथ ही, इससे इलाज पर होने वाला खर्च भी काफी हद तक कम किया जा सकता है.
रिसर्च में मिली जांच प्रणाली की खामियां
बीएमजी ऑन्कोलॉजी जर्नल में छपे रिसर्च कि मुताबिक, 2022 से 2023 के बीच यूके और आयरलैंड में 2,500 से ज्यादा गर्भाशय कैंसर मामलों का रिसर्च किया गया. इसमें पाया गया कि 91% मामलों में ट्यूमर की लिंच सिंड्रोम के लक्षणों के लिए जांच की गई, लेकिन जांच के नतीजे डॉक्टरों की पूरी टीम तक नहीं पहुंचे. परिणामस्वरूप, आवश्यक जेनेटिक काउंसलिंग और ब्लड टेस्ट की प्रक्रिया अधूरी रह गई.
अधूरी प्रक्रिया, अधूरी पहचान
जिन मरीजों को जेनेटिक काउंसलिंग की जरूरत थी, उनमें से केवल दो-तिहाई को ही इसके लिए भेजा गया, और लंबी प्रतीक्षा सूची के कारण महज 48% मरीजों की ही जांच हो सकी. इसका सीधा असर यह हुआ कि कई मरीजों में लिंच सिंड्रोम की पहचान नहीं हो पाई और उनका कैंसर का खतरा बढ़ा रहा.
जागरूकता और बेहतर व्यवस्था की जरूरत
यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग के सेंटर फॉर रिप्रोडक्टिव हेल्थ के क्लिनिकल लेक्चरर डॉ. नील रयान ने कहा, "दिशानिर्देश और जांच दर अच्छी होने के बावजूद, यदि मरीजों को ब्लड टेस्ट के लिए समय पर नहीं भेजा जाता तो यह पूरी प्रक्रिया बेकार हो जाती है. यह न सिर्फ मरीज के लिए, बल्कि उनके परिवार के लिए भी बड़ा खतरा है.
शोधकर्ता कहते हैं कि यदि समय पर पहचान हो जाए तो एस्पिरिन जैसी दवाओं, नियमित कोलोनोस्कोपी और हिस्टेरेक्टॉमी जैसे उपायों से भविष्य में कैंसर का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है.
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