“मुझे लगता है मेरे पिता ने मुझे अपने साथ इसलिए रखा है ताकि मैं सब्ज़ी बेचने में उनकी मदद कर सकूं।”
जब एक सब्ज़ी बेचने वाली लड़की अपने प्रेमी से यह बात कहती है, तो दिल अपने आप पिघल जाता है। उसका प्रेमी कोई आम इंसान नहीं, बल्कि एक सीवर साफ़ करने वाला मजदूर है।


यह फिल्म एक ऐसी प्रेम कहानी दिखाती है जो किसी भी चमकदार, सपनों से भरी Saiyaara  कहानी से कहीं ज़्यादा बड़ी और सच्ची है। एक सीवर साफ़ करने वाले युवक और एक सब्ज़ी बेचने वाली लड़की की यह प्रेम कथा असामान्य जरूर है, लेकिन इसमें इंसानियत, सच्चाई और दर्द इस कदर भरा है कि यह सीधे दिल में उतर जाती है।


फिल्म सीवर साफ़ करने वालों की ज़िंदगी को बेहद करीब से दिखाती है। उनकी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी , उनकी थकान, उनकी खामोश तकलीफें  सब कुछ इतनी ईमानदारी से पेश किया गया है कि दर्शक उन्हें गले लगाने का मन करने लगता है।
एक सीन में जब वह किरदार बहुत सहजता से कहता है,
“40 की उम्र के बाद हमारा शरीर जवाब देने लगता है,”
तो यह बात  बिना किसी Drame के दिल को झकझोर देता है। इस फिल्म में ईशिता सिंह का अभिनय काबिल-ए-तारीफ है। वह AAP के सांसद संजय सिंह की बेटी हैं, लेकिन आप लोग ये  फिल्म देखनी हो तो इस वजह से नहीं, बल्कि इसलिए देखना कि उन्होंने अपने किरदार को पूरी सच्चाई और संवेदनशीलता के साथ निभाया है। वहीं निर्देशक Sanjay Bishnoi  का काम भी काबिले-गौर है, जिन्होंने इस कहानी को बिना बनावट और दिखावे के बड़े पर्दे पर उतारा है। फिल्म का संगीत कहानी के मूड के साथ पूरी तरह मेल खाता है और भावनाओं को और गहराई देता है। खास बात यह है कि फिल्म का अंत बिल्कुल भी Predictable नहीं है, और यही इसे Perfect सिनेमा अनुभव बनाता है। कुल मिलाकर, यह फिल्म सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि समाज के उस हिस्से की आवाज़ है जिसे हम अक्सर अनसुना कर देते हैं।  हमारी तरफ से इसे रेटिंग: 5 में से 4 स्टार यह फिल्म हर हाल में देखी जानी चाहिए क्योंकि यह आपको सिर्फ Entertain  नहीं करती, बल्कि आपको महसूस भी कराती है।