अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ के ऐलान के साथ वैश्विक व्यापार जगत में मची उथल-पुथल के बीच गुरुवार (6 नवंबर, 2025) को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट फैसला सुना सकती है. बुधवार की हियरिंग में जजों ने टैरिफ को लेकर ट्रंप की कानूनी अधिकारिता पर सवाल उठाए. कोर्ट का ये रुख ट्रंप के सपोर्ट में नहीं देखा जा रहा है. वहीं, दूसरी तरफ पूरी दुनिया की निगाहें इस फैसले पर टिकी हुई हैं.


5 नवंबर को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में आखिरी सुनवाई शुरू हुई, जिसमें ज्यादातर जजों ने ट्रंप के फैसले पर सवाल खड़े किए. इससे पहले निचली फेडरल कोर्ट ने टैरिफ को लेकर फैसला सुनाया था कि ट्रंप के पास अमेरिका के कई व्यापारिक साझेदारों से आयात पर टैरिफ लगाने और कनाडा, चीन और मैक्सिको के उत्पादों पर फेंटानिल टैरिफ लगाने का कानूनी अधिकार नहीं है. निचली कोर्ट के फैसले के बाद ट्रंप ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.


ट्रंप की टैरिफ पॉलिसी को छोटे व्यापारियों और 12 राज्यों के समूह ने चुनौती दी है और इसे लेकर तीन मुकदमे दर्ज हुए हैं. याचिकाओं में इस बात को आधार बनाया गया है कि टैरिफ लगाने से पहले ट्रंप ने इससे पड़ने वाले असर के बारे में नहीं सोचा और न ही स्थिति समझने की कोशिश की. याचिका में कहा गया है कि ट्रंप ने प्रशासन के साथ न तो कोई आधिकारिक बैठक की और न ही इसे लेकर किसी तरह की कोई रिपोर्ट तैयार की गई. ट्रंप को सुप्रीम कोर्ट में साबित करना है कि उनके लिए गए फैसे तार्किक और संवैधानिक रूप से सही हैं या नहीं.


न्यूज एजेंसी आईएएनएस की रिपोर्ट के अनुसार टैरिफ को लेकर करीब ढाई घंटे से ज्यादा कोर्ट में बहस चली. कोर्ट ने ट्रंप सरकार के टैरिफ के फैसले पर सवाल उठाए. जस्टिस सोनिया सोतोमयोर ने कहा, 'आप कहते हैं कि टैरिफ टैक्स नहीं हैं, लेकिन वास्तव में वे टैक्स ही हैं. वे अमेरिकी नागरिकों से पैसा, राजस्व कमा रहे हैं.'


इस पर सॉलिसिटर जनरल जॉन सॉयर ने कहा, 'मैं इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं कह सकता, यह एक नियामक टैरिफ है, टैक्स नहीं. यह सच है कि टैरिफ से राजस्व बढ़ता है और यह केवल आकस्मिक है.' इसके अलावा जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स ने कहा, 'अगर मैं सही नहीं हूं तो मुझे सुधारें, लेकिन यह तर्क किसी भी देश के किसी भी उत्पाद पर, किसी भी मात्रा में, किसी भी अवधि के लिए टैरिफ लगाने की शक्ति के लिए दिया जा रहा है.'


जस्टिस रॉबर्ट्स की इस टिप्पणी के बाद अमेरिकी सॉलिसिटर जनरल डी. जॉन सॉयर ने तर्क दिया कि आईईईपीए राष्ट्रपति को इमरजेंसी की स्थिति के दौरान आयात को विनियमित करने की इजाजत देता है. अमेरिकी सॉलिसिटर जनरल के तर्क से जस्टिस एमी कोनी बैरेट सहमत नहीं थीं. उन्होंने सॉयर से कहा, 'क्या आप संहिता में ऐसे किसी दूसरे स्थान या इतिहास में किसी दूसरे समय का जिक्र कर सकते हैं, जहां आयात को विनियमित करना वाक्यांश का उपयोग टैरिफ लगाने का अधिकार देने के लिए किया गया हो?'


इसके अलावा, जस्टिस बैरेट ने कहा कि अगर कांग्रेस भविष्य में आपातकालीन टैरिफ पर किसी भी सीमा को मंजूरी देना चाहती है, तो उसे राष्ट्रपति के वीटो को पार करने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी. जस्टिस बैरेट ने पूछा, 'अगर कांग्रेस कहती है, अरे, हमें यह पसंद नहीं है, इससे राष्ट्रपति को आईईईपीए के तहत बहुत ज्यादा अधिकार मिल जाते हैं, तो उसे आईईईपीए से उस टैरिफ शक्ति को वापस लेने में बहुत मुश्किल होगी, है ना? हालांकि, कोर्ट की तरफ से मामले में अब तक आखिरी फैसला सामने नहीं आया है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति के टैरिफ वाले फैसले पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने सवाल खड़े किए हैं.