सुप्रीम कोर्ट ने 2008 में 400 करोड़ रुपये के कथित मत्स्य पालन घोटाला मामले में गुजरात के पूर्व मंत्री दिलीप संघानी के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को बृहस्पतिवार को रद्द कर दिया. जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कथित अपराध के तत्वों की कमी को रेखांकित किया.


पीठ ने कहा, 'हम अपीलकर्ता द्वारा दी गई इस दलील को स्वीकार करते हैं कि जांच रिपोर्ट, शिकायतकर्ता या पुलिस अधिकारियों से दर्ज किये गये आरोप-पूर्व बयानों या यहां तक ​​कि जांच दल द्वारा पूछताछ किए गए व्यक्तियों के बयानों में एक भी ऐसी सामग्री उपलब्ध नहीं है, जो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत प्रावधानों के तत्वों को आकृष्ट करती हो.'


फैसले में कहा गया, 'अपीलकर्ता के आरोपमुक्त किये जाने के अनुरोध संबंधी आवेदन को विशेष अदालत द्वारा स्वीकार किया जाना चाहिए था, खासकर तब जब दूसरे आरोपी/अपीलकर्ता द्वारा रिश्वत मांगने और स्वीकार करने का कोई आरोप ही नहीं है.' पूर्व मंत्री की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने जांच रिपोर्ट या जांच दल द्वारा पूछताछ किए गए व्यक्तियों के बयानों में उनके मुवक्किल के खिलाफ अनुदान जारी करने के बदले रिश्वत की मांग या स्वीकृति के ऐसे किसी भी आरोप से इनकार किया.


सुप्रीम कोर्ट का फैसला गुजरात हाईकोर्ट के 26 जुलाई, 2024 के आदेश के खिलाफ संघानी द्वारा दायर अपील पर आया. हाईकोर्ट ने विशेष भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) अदालत के 12 मार्च, 2021 के आदेश को बरकरार रखा था, जिसमें मामले में उनके आरोपमुक्त करने संबंधी आवेदन को खारिज कर दिया गया था.


यह कथित घोटाला 2008 का है, जब परषोत्तम सोलंकी मत्स्य पालन राज्य मंत्री थे और संघानी गुजरात में कृषि मंत्री थे. यह आरोप लगाया था कि निविदा प्रक्रिया का पालन किए बिना मछली पकड़ने के ठेके आवंटित करके नियमों का उल्लंघन किया है. पालनपुर के एक व्यवसायी इशाक मराडिया ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि सोलंकी ने निविदा प्रक्रिया का पालन किए बिना मछली पकड़ने के ठेके आवंटित करके नियमों का उल्लंघन किया है.


सोलंकी ने दावा किया था कि संघानी ने मत्स्य पालन के ठेके दिए थे, क्योंकि उस समय वह कैबिनेट मंत्री थे. राज्य सरकार द्वारा सोलंकी के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी नहीं दिए जाने के बाद मराडिया ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. हालांकि, 30 जुलाई, 2012 को गुजरात की तत्कालीन राज्यपाल डॉ. कमला बेनीवाल ने राज्य मंत्रिमंडल के फैसले को खारिज कर दिया था और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत सोलंकी के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी दे दी थी.


इसके बाद मराडिया ने एसीबी अदालत में एक आवेदन दायर कर सोलंकी और संघानी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी. सोलंकी और संघानी के खिलाफ मामला दर्ज होने के बाद गांधीनगर की एसीबी अदालत ने मई 2013 में भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसी को आरोपों की जांच कर रिपोर्ट सौंपने को कहा था. अदालती दस्तावेज के अनुसार, एसीबी ने 2015 में अदालत के समक्ष अपनी रिपोर्ट पेश की थी, जिसमें मत्स्य पालन के ठेके देने में अनियमितताओं का संकेत दिया गया था.


 


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